Wednesday, October 9, 2013

बजी है रागिनी

निकल आया अचानक ज्यों रुपहला चाँद बादल से।
कली ज्यों मुस्कराई है छुअन पर ओस के जल से।
उमस के बीच में सहसा लगी ठण्डी हवा बहने, 
बजी है रागिनी निश्चित तुम्हारी शोख पायल से।।
डॉ राजीवराज 
9012780006

जग ने समझा हमने गीत सुनाये हैं

जब जब दर्द आदमी का उपहास बना।
मानस वैभव की चौखट का दास बना।
अर्थ अर्थ बस अर्थ अनबुझी प्यास बना।
छल का ही पर्याय जबकि विश्वास बना।
मन के आसमान से शब्दों के पंछी
उड़कर अधरों की डाली पर आये हैं।
जग ने समझा हमने गीत सुनाये हैं।।

अजब सभ्यता की यह नूतन भोर है
मानवता का ही क्रंदन चहुंओर है
फुटपाथों से मंदिर की सीढ़ियों तलक
भूख ने सत्ता फैला ली पीढ़ियों तलक
हमने उस माँ के आँसू पोंछे जिसने
सूखी छाती से बच्चे बहलाये हैं।।
जग ने ...........

खेतों में संगीन उगाने वालों को।
खादी पहने बीन बजाने वालों को।
प्यार की बस्ती पर सोने की तोपों से
मतलब की बारूद उड़ाने वालों को।
अभिनन्दन में मधुर सुगन्धित हार नहीं
हमने शब्दों के अंगार चढ़ाए हैं।।
जग ने........

सुलग सभ्यता रही,आग ही आग दिखे।
अपनी अपनी ढपली अपना राग दिखे।
जाति ,क्षेत्र , मज़हब में बाँट रहे धरती
पहन हंस के कपड़े उड़ते काग दिखे।।
परिवर्तन हित संस्कार शालाओं में
हमने तो बस क्रांति बीज बिखराए हैं।।
जग ने.........

भावों की नगरी का कोई बंजारा,
राजनगर में भटका जब मारा मारा
सारी उम्र व्यक्त होने को तड़पा है
प्रेम सदा निर्धन का बेबस बेचारा
कितनी आँखों की लावारिस बूंदों पर
अंजुरी में ले हमने शब्द सजाए हैं।।
डॉ राजीव राज

Wednesday, July 31, 2013

ग़ज़ल

इस मन में ही बीज नफरतों का फलता है।
और इसी में प्यार का पंछी भी पलता है।।

ये तो फितरत थी अपनी कि बन गए बख्तर।
वर्ना खंज़र  में भी फ़ौलाद वही ढलता है।।

रात जो स्याह अँधेरे का महासागर है।
वहीँ से रौशनी का देवता निकलता है।।

खोल सावन ने घटाओं के दिए हैं जूड़े । 
लबों पे आज कोई गीत सा मचलता है।।

चाँद को देख फिर से  रूठ गया है नादाँ 
दिल है कान्हा खिलोनों से कब बहलता है।।

डॉ राजीव राज
इटावा 

  

Monday, April 29, 2013

नन्हा कुबेर....

वह बच्चा
जो चीख मारकर
माँ का आँचल पा लेता है।
प्रभु सा संबल पा लेता है।
वह नन्हा कुबेर किस्मत का,
ममता की दौलत है जिसपर, मैं हूँ।
मुझको माँ से बहुत प्यार है।।

वह बच्चा
जो पाँव बढ़ाकर
जीवन की अनजान डगर पर
चला, गिरा तो सदा संभाला।
अन्न दिया और जिसको पाला।
ऋण धरती का जिसके तन पर,मैं हूँ।
मुझे धरा से बहुत प्यार है।।

वह बच्चा
जो यौवन रथ पर
चढ़ने को दिखता है तत्पर।
संस्कृति का पोषण करने को,
बदरंग सभ्यता में इन्द्रधनुष के रंग भरने को
भटक रहा है,झटक रहा है नन्हे कर,मैं हूँ।
मुझे सृजन से बहुत प्यार है।।

डॉ राजीव राज
९४१२८८000६ 



Sunday, April 28, 2013

BAAL KAVITA - BACHCHA


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डॉ राजीव राज 


Tuesday, March 19, 2013

होली का रंग चढ़ा है

होली का रंग चढ़ा है जब से उमंग पर,
महुए ने मस्तियाँ लिखी हैं अंग अंग पर,
चाहत की मांग में भरा सिन्दूर प्यार ने,
थिरकी है फाग फिर से मन की मृदंग पर।।

Friday, March 15, 2013

बासंती रंगों से भर जाये ज़िन्दगी

महुए की गन्धों से,तितली के पंखों से,
जल की तरंगों से, सीपी  से, शंखों  से,
बहती  उमंगों  से,
बहती  उमंगों  से  भर जाये ज़िन्दगी।
बासंती रंगों  से  भर  जाये  ज़िन्दगी।।

पर्वत की छाया में झील के पलंग पर,
सोया  है जीवन का  राग ओढ़ चादर।
झरनों की कल-कल पे,
जल-कण की झल-मल पे बल खाए ज़िन्दगी।
मीत प्रीत परिमल से भर जाये ज़िन्दगी।।१।।

फागुन की गुन गुन और एकाकी ये क्षण ,
पायल की  रुन- झुन दे नेह का निमंत्रण ,
अरुनारे होठों से,
आँचल  की ओटों  से  घर आये  जिन्दगी।
मेंहदी- महावर  से  भर  जाये  ज़िन्दगी।।२।।

ऊषा  की किरनें ज्यों घुंघटा  उघार कर,
अम्बर पर नाच रहीं  सोलह श्रृंगार कर,
अंतस की शाखों पे,
सुधियों की पाँखों से भर  जाये जिन्दगी।
मोती बन आँखों से  झर  जाये जिन्दगी।।३।।  

Sunday, March 10, 2013

होली की धुन

गेसू  निशा के खुल गए, बेला महक उठा।
आँखों से पी के महुआ फागुन बहक उठा।
चाहत के गाल पर गुलाल प्यार ने मला,
होली की धुन पे मन का पंछी चहक उठा।।

डाo राजीव राज  

Saturday, March 2, 2013

कवि वो......


बारिश वो ज़िन्दगी जो ज़मीं पर उभार दे।
है  वो  हवा  जो  देह  की  थकन उतार  दे।
वादक न सिर्फ अपनी पीर बांसुरी का हो,
कवि वो जो ज़माने के दर्द को दुलार दे।।

रूप चांदनी

यौवन  की  देहरी  पे  अल्पना  संवर  गयी।
सपनों के दीप आँख के आँगन में धर गयी।
बेला सी खिल उठी सुकल्पनाओं की कली,
मन पे ये किसकी रूप चांदनी बिखर गयी।।

बारिश वो ज़िन्दगी जो ज़मीं पर उभार दे।
है  वो  हवा  जो  देह  की  थकन उतार  दे।
वादक न सिर्फ अपनी पीर बांसुरी का हो,
कवि वो जो ज़माने के दर्द को दुलार दे।।

Wednesday, February 27, 2013

मधुमास रहेगा

चिन्ता  न  करो  कैसा  इतिहास रहेगा।
वेणी में,मुकुट में,कि रज में वास रहेगा।
उर के निलय में  फूल सी सुगंध तो रखो 
फिर तुम जहाँ वहीँ पर मधुमास रहेगा।।

जीवन की डायरी

पूछो न हमको इससे क्यों प्यार बहुत है।
हालाँकि   याद के  घड़े  में भार  बहुत है।
चाहा था फोड़ना समय के फर्श पर मगर ,
सच है कि दिल से आदमी लाचार बहुत है।।


प्राणों  में  कौन आकर  निर्वात भर गया।
आँखों में बिना मौसम बरसात भर गया।
पल भर को उजाले की ओर देख क्या लिया
तकदीर में वो उम्र भर को रात भर गया।।


जीवन की डायरी पे दस्तखत बना गयी।
तकदीर हमें बिन पते का ख़त बना गयी।
यों  तो  हमें  भी  याद  उसूलों  के पाठ थे,
मजबूर हमको लेकिन गुर्बत बना गयी।।

Tuesday, February 26, 2013

सूर्य का बिछौना

पीर कुछ  भी नहीं  है प्राण का खिलौना है।
ओस आँसू की सुख के सूर्य का बिछौना है।
ज़िन्दगी के हरएक पल को जियो जी भर के,
बाद जीवन के जो होना है सो तो होना है।।

अपनी आशाओं को विश्वास बनाकर देखो।
कर्म की शक्ति से इतिहास  बनाकर  देखो।
ज़िन्दगी की फसल भी लहलहा के झूमेगी ,
दुःख के माहौल को उल्लास बनाकर देखो।।

Saturday, February 23, 2013

पिंजड़े से जैसे छूट के....

पिंजड़े  से  जैसे  छूट के पंछी निकल गया ।
दिनमान सुख का ऐसे हमेशा को ढल गया।
वो कल भी थी मोहताज़ निवालों को आज भी,
सरकार बदलने से उसका क्या बदल गया ?

हिमालय

पीड़ा  धरा की देख न पाया विव्हल हुआ।
रोया  तो बही यमुना गंगा में जल हुआ।
दुनियाँ में हिमालय सा बड़ा कौन हो सका
पाषाण हो के भी जो सृष्टी हित तरल हुआ।।


Tuesday, February 19, 2013

जीवन का अर्थ ..

जीवन का अर्थ , अर्थ शब्दकोश  में  कहाँ
भावों की गिन्नियां हृदय के कोष में कहाँ
सब मूल्यवान हो गए, पर मूल्य खो गए 
वैभव की चकाचौंध है, हम होश में कहाँ।।

पूनम   के रेशमी  स्वरुप  पर  मचल  गया।
छूने  को  चाँद  जैसे  समन्दर  उछल  गया।
देकर  व्यथा  पहाड़  सी  ये  उम्र  का  हिरन ,
जीवन से दूर किसकी खोज में निकल गया।।

Sunday, February 17, 2013

चिट्ठियाँ

मधुमास छिपा है कहीं वनवास छिपा है।
चिट्ठी के शब्द शब्द में अहसास छिपा है।
सम्बोधनों से हीन, शब्दहीन, अर्थमय
वाक्यों का वो अजीब सा विन्यास छिपा है।।


चिट्ठी के शब्द-शब्द में इतिहास छिपा है।
उच्छ्वास छिपा है कहीं उल्लास छिपा है।
जीवन के ख़ास राज़ की चाबी हैं चिट्ठियाँ ,
मत पूछिए कि इनमे कौन ख़ास छिपा है।।

गीतों में मेरे इसलिए....

संवेदनाओं  का  प्रवाह  श्रोत  हृदय  है।
सुख सर्जना जहाँ है वहीं दुःख प्रलय है।
जीवन ही चूंकि आग और जल से है बना
गीतों में मेरे अथ विरह के संग प्रणय है।।

Tuesday, February 12, 2013

..... मगर गीत नहीं है

जो साधना विहीन है  संगीत नहीं है।
जो भावना विहीन है वो मीत नहीं है।
आँसू न जिसका शब्द-शब्द चूमने लगे
शब्दों की व्यवस्था है मगर गीत नहीं है।।

गीतों में भर के मैं ह्रदय का ज्वार सौंपने।
आदर्श  हो  रहे  हैं  तार - तार  सौंपने।
टकसाल वाली राह को आया हूँ छोड़कर
लाया हूँ स्वाभिमान की हुँकार सौंपने।।

Wednesday, February 6, 2013

भक्त होने को

भाव की तरह वो तड़पी है व्यक्त होने को
प्रेम के पंथ  पर  गमन  विरक्त  होने को
साथ रहकर भी न रिश्ते को नाम दे पाई
राधिका तब बनी मीरा थी भक्त होने को  

Friday, February 1, 2013

और दो कराह मीत गीत को निखार दो...

दर्द   को   उभार   दो , वेदना   अपार   दो।
मैं करूँ समर्पण तुम किन्तु तिरस्कार दो।
और दो कराह मीत गीत को निखार  दो।।

प्राण ने दिया उड़ेल पुतलियों के द्वार पर
और पलक ने धकेल आँख को बुहार कर।
निष्ठुर निष्कासन यों पूंछ पूंछ कारन क्यों
अश्रु अनाश्रित, उदास, बैठ गए हार कर।

शब्द के अभाव को, भाव के प्रवाह को ,
अंतर्मन से उपजी अंतस की आह को
प्रीत की प्रतीत के स्वरुप को दुलार दो।।
और दो कराह मीत गीत को निखार  दो।।

वक़्त के धरातल पे, टूट  जो  बिखर गया।
सांस सांस बांसुरी में बस विराग भर गया।
जो मिलन की आस था सुख का अहसास था
भोर की हिलोर बोल वो सपन किधर गया।

रैन  के  खुमार  को,  नैन  की  बहार  को
तप्त तृषित मन पे प्रिय छविमय बौछार को
पालकी सपन की सजन द्वार पे उतार दो।।
और दो कराह मीत  गीत  को  निखार  दो।।

दर्द   को   उभार   दो , वेदना   अपार   दो
मैं करूँ समर्पण तुम किन्तु तिरस्कार दो
और दो कराह मीत गीत को निखार  दो

डॉ राजीव राज 9412880006

Thursday, January 24, 2013

मतदान ज़रूरी है .......


अब आज़ादी के सपने में ,सच के नवीन रंग भरने में 
जो तुमने आनाकानी की ,आलस्य किया नादानी की 
तो सामंती बैसाखी पर फिर होगा लंगड़ा लोकतंत्र 
इन स्थितियों से बचना है तो गुन लो प्यारे एक मन्त्र 
मतदाताओं का जागृति अभियान ज़रूरी है 
लोकतंत्र  की रक्षा  हित  मतदान  ज़रूरी है 

ऊंचे ऊँचे  महलों वाले भी फिरते द्वारे द्वारे हैं 
उम्मीदें बाँट रहे सबको वादों के खुले पिटारे हैं 
जीवन की जलती धरती पर जैसे बादल घिर आये हैं 
बरसाती मेढक ,झींगुर सब अपना आलाप लगाये हैं 
अवसरवादी मंडूकों का अवसान जरूरी है 
लोकतंत्र  की रक्षा  हित  मतदान  ज़रूरी है

कश्ती स्वराज की जो निकालकर  लाये थे तूफानों से 
रखना संभालकर कहकर सौंपी थी कितने अरमानों से 
उन अमर शहीदों ने पाए विश्वासघात के छाले हैं 
कश्ती को वे ही लूट रहे हैं जो पतवार संभाले हैं 
मित्रो अब रक्षक भक्षक की पहचान जरूरी है 
लोकतंत्र  की रक्षा  हित  मतदान  ज़रूरी है

Wednesday, January 23, 2013

वतन की धूल भी जिनके लिए थी चन्दन सी....




मौत  से आँख मिलाती हुई जवानी है .
 हौसला लौह समंदर की सी रवानी है
वतन की धूल भी जिनके लिए थी चन्दन सी,
निसार ऐसे शहीदों पे जिंदगानी  है ..

सिर्फ संघर्ष ही ईमान बना लेते हैं
राष्ट्र की अस्मिता को आन बना लेते हैं
सरहदों पे तने जांबाज़ जवानों को नमन
मौत को अपनी जो बलिदान बना लेते हैं 

Sunday, January 6, 2013

जियो तो जिन्दगानियों में ज़वानी भर के ......

दिल्ली में हुयी ह्रदय विदारक घटना के बाद ......

इससे बढ़कर कोई बलिदान हो नहीं सकता
प्राण से बढ़के और दान    हो   नही  सकता
यूँ उठा ज्वार कि दहली दरिंदगी खुद भी
जागरण से बड़ा  तूफ़ान हो नही सकता


सो गयी देश की  रग रग में रवानी भर के
नर्म आँखों में गर्म गर्म सा पानी भर के
एक बेटी की शहादत ने ये कसम दी है
जियो तो जिन्दगानियों में ज़वानी भर के