Saturday, November 17, 2012

पाँच मुक्तक और ........

उम्र  की  शाम  भी चाहो  जो  सुहानी  रखना
दिल के गुलदान में कुछ याद पुरानी रखना
प्यास होठों की ख़त लिखे जो तुम्हे आँसू के
चूमने के लिए दिलबर की निशानी रखना


हर एक सांस सुरीला सितार हो जाये
और जीवन  ये महकती बयार हो जाये
तुम जो स्वीकार कर लो नेह निमंत्रण मेरा
मेरा दावा है ये मन गीतकार हो जाये


अब तो इन बंद मुट्ठियों को खोलना होगा
दिल की डांडी पे पाप पुन्य तोलना होगा
इससे पहले कि पीढ़ियों के गुनहगार बने
मौन को तोड़कर हम सबको बोलना होगा


जब कभी मंदिरो - मस्जिद में पाप होता है
यकीन मानिये भगवान का दिल रोता है
हो गुनहगार पुजारी या मौलवी कोई
बोझ तो पाप का सारा समाज ढोता है


अजनबी शहर में पहचान को तरसे कितने
भीड़ में एक अदद इन्सान को तरसे कितने
तोड़ जो जन्म का बंधन तलाक दे आयी
ये मेरे लब उसी मुस्कान को तरसे कितने


Wednesday, November 14, 2012

छः मुक्तक

व्यंजना की धरा पे नभ सा व्याकरण होगा
शब्द की रूह तक पे सत्य का वरण होगा
वेदना देवकी है क़ैद मन की कारा में
गीत का आज कन्हैया सा अवतरण  होगा

 चेतना हूँ  मैं   सिर्फ़ मुझको जागरण  दे दो
भावना हूँ  मैं  सुकोमल सी आवरण दे दो
 आह संवेदना की आँख से मैं छलका हूँ
गीत हूँ अपने अधर पर मुझे शरण  दे दो


तुम्हारी आस मेरी साँस की रवानी है
दिल तुम्हारी ही चाहतों  की राजधानी है
आ भी जाओ कि सूखती है भोर की तुलसी
तुम्हारे बिन न महकती ये रात रानी है

थाम  लो हसरतों का ज्वार मुझे छूलो ना
दिल को आ जायेगा करार मुझे छूलो ना
चेतना सी जो मेरी ज़िन्दगी की सोई है
जाग जायेगी बस एकबार मुझे छूलो ना

मैं अपने आंसुओं का अर्घ्य चढ़ाने आया
वेदना की  जटा से गीत  बहाने आया
भूख से जिनका दम निकल गया गरीबी में
मैं भगीरथ उन्ही को मुक्ति दिलाने आया

बंद कमरे में ही दुनियां समेट लेते हैं
कब कहाँ क्या-2 हो रहा है देख लेते हैं 
गज़ब ये डिजिटली बन्दे हैं नयी पीड़ी के
दिमाग से ही दिल की जंग जीत लेते हैं




   

.........कविता दुखियारी तब फूट फूट रोई

सत्ता षडयंत्र दिखे,   बेबस गड्तंत्र दिखे
बारूदी पिंजर में ,    जीवन परतंत्र दिखे
चेतन है ठगा ठगा चहुँदिश जडतन्त्र दिखे
आँगन ने   कटुता की नागफनी बोई
कविता दुखियारी कल फूट फूट रोई

             अधरों के गाँव छोड़कर कहाँ मुस्कुराहटें चलीं गयीं
             लाज की महावर रंगीं पायल की आहटें चलीं गयीं
घायल सम्बन्ध दिखे, आहत अनुबंध दिखे
रिश्तों की धरती पर स्वारथ छलछंद दिखे
गुमसुम सी राखी है,टूटी  बैसाखी   है
भौजी संग देवर की नोंक   झोंक  खोई
कविता दुखियारी तब  फूट फूट रोई

             कबिरा की राह निहारी, तुलसी को टेर लगाई
             मीरा रसखान की डगर हारी पर हेर न पाई
कोई तो स्वजन दिखे,शब्दशिल्प सृजन दिखे
भाव भूमि 'देव' तुल्य , 'सूरा' सम गगन दिखे
आहत मन पाखी है ,  क्षत - विक्षत साखी है
मानस की दशा देख ओढ़नी भिगोई
कविता दुखियारी तब  फूट फूट रोई

              मानवता राजपथ पकड़, वैभव की नींद सो गयी 
              सन्नाटों के ऊसर में, आहों के बीज बो गयी
संवेदन हीन दिखे, भावना विहीन दिखे
चेहरे पर चेहरों की कला में प्रवीन दिखे
पीड़ाएँ गहरीं  हैं , सोये युग प्रहरी हैं
अर्थ के समंदर में लेखनी डुबोई
कविता दुखियारी तब  फूट फूट रोई
शारदा की बिटिया तब  फूट फूट रोई

                                          डॉ राजीव राज, इटावा
                                           09412880006