Monday, October 26, 2009

सच की खामोशी भी ..........

मुद्दत से होठों पर आकर ठहरी है
सच की खामोशी भी कितनी गहरी है

ढांढस कौन बंधाए,किससे पीर कहूं
हर पिंजडे में बुलबुल गूंगी , बहरी है

अज़ब करिश्मा है बचपन के चश्मे से
सुबह सलोनी सी दिखती दोपहरी है

घर के बूढ़े सदर द्वार को पूछे कौन
हर कमरे की अपनी अपनी देहरी है

जिसके कुरते पर है जितना कलफ चढ़ा
सलवट उस पर उतनी ज्यादा गहरी है

Sunday, October 4, 2009

इतने कहाँ समर्थ ?

आकर्षण व्यक्तित्व में , पाया ललित स्वभाव ।

जनपद कैसे सहेगा , तुमसे ये अलगाव ॥

स्वर में कम्पन हो रहा ,शब्द खो रहे अर्थ।

तुम्हे विदाई दे सकें , इतने कहाँ समर्थ ॥