मुद्दत से होठों पर आकर ठहरी है
सच की खामोशी भी कितनी गहरी है
ढांढस कौन बंधाए,किससे पीर कहूं
हर पिंजडे में बुलबुल गूंगी , बहरी है
अज़ब करिश्मा है बचपन के चश्मे से
सुबह सलोनी सी दिखती दोपहरी है
घर के बूढ़े सदर द्वार को पूछे कौन
हर कमरे की अपनी अपनी देहरी है
जिसके कुरते पर है जितना कलफ चढ़ा
सलवट उस पर उतनी ज्यादा गहरी है