Monday, November 2, 2009

hindyugm unikavita pratiyogita me puraskrit kavita

Sunday, October 18, 2009

रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ

नामः डॉ. राजीव ‘राज’
पिता का नामः श्री प्रेम बाबू यादव
माता का नामः श्रीमती शकुन्तला यादव
शैक्षिक योग्यताः बी.एस-सी., एम.एस-सी.,पी-एच.डी. (रसायन) एम.ए. (हिन्दी साहित्य एवं संस्कृत), साहित्य रत्न प्रयाग विश्वविद्यालय, बी.एड.
सम्प्रतिः शिक्षक, शिव नारायण इण्टर कॉलेज, इटावा
पत्र व्यवहार का पताः 239, प्रेम बिहार,
विजय नगर, इटावा पिन- 206001
ई-मेलः dr_rajeevraj@yahoo.com
ब्लागः vednakephool.blogspot.com
सितम्बर माह की प्रतियोगिता में इनकी कविता ने दसवाँ स्थान बनाया।

पुरस्कृत कविता

अर्घ गंगाजल का चाहे देवता,
आँख के आंसू न कोई देखता,
अर्थपूरित हो गयी हैं अर्चनाएं
अथ प्रदूषित हो गयीं हैं सर्जनाएं,
घंटियों में भी नहीं संगीत है
मंदिरों ने भी बदल दी नीत है,
पीर अंतर में लिए जाऊं कहाँ?
किसको सुनाऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

दर्द अब केवल नहीं कश्मीर है,
भारती के अंग अंग में पीर है
मुम्बई, गुजरात देखो रक्तरंजित,
जम्मू,काशी घाट भी लगता प्रकम्पित
बम से थर्राई है जब-जब राजधानी,
अंजुरी भर ढूढता जल स्वाभिमानी
आह माँ की भूल कैसे
मैं खुशी के गीत गाऊँ?
राष्ट्र ऋण का बोध मैं कैसे भुलाऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

भोर पर छाई निशा की कालिमा,
भूख ने बचपन की छीनी लालिमा
काश जो करते कलम की नोंक पैनी,
उन कारों में है हथौड़ा और छैनी
शीश पर अपने गरीबी ढो रहे हैं,
भोजनालय में पतीली धो रहे हैं
जो खिलौना चाँद का मांगे
कहाँ वो कृष्ण पाऊँ?
रो रहा बचपन मैं कैसे मुस्कराऊँ?
वेदना के फूल मैं किस पर चढाऊँ?

Monday, October 26, 2009

सच की खामोशी भी ..........

मुद्दत से होठों पर आकर ठहरी है
सच की खामोशी भी कितनी गहरी है

ढांढस कौन बंधाए,किससे पीर कहूं
हर पिंजडे में बुलबुल गूंगी , बहरी है

अज़ब करिश्मा है बचपन के चश्मे से
सुबह सलोनी सी दिखती दोपहरी है

घर के बूढ़े सदर द्वार को पूछे कौन
हर कमरे की अपनी अपनी देहरी है

जिसके कुरते पर है जितना कलफ चढ़ा
सलवट उस पर उतनी ज्यादा गहरी है

Sunday, October 4, 2009

इतने कहाँ समर्थ ?

आकर्षण व्यक्तित्व में , पाया ललित स्वभाव ।

जनपद कैसे सहेगा , तुमसे ये अलगाव ॥

स्वर में कम्पन हो रहा ,शब्द खो रहे अर्थ।

तुम्हे विदाई दे सकें , इतने कहाँ समर्थ ॥

Thursday, September 10, 2009

आदमी

हर आदमी में होते है दस बीस आदमी
जिसको भी देखना हो कई बार देखना
मैंदा की जीत हार तो किस्मत की बात है
टूटी है किसके हाथ में तलवार देखना

                                     -  निदा फाजली 

Monday, September 7, 2009

आगाज़ आप हैं......

माना कि हम नहीं हैं माँ बाप आपके

ज्यादा न चंद रोज़ से हैं साथ आपके

हम आपकी खुशी का सबब हों न हों मगर

गम आपका बहेगा इन आँखों के रास्ते।


अंजाम मेरा जो भी हो,आगाज़ आप हैं

एक बेजुबान गीत हैं हम साज़ आप

हैं हम हम बने तो सिर्फ और सिर्फ आपसे

कल आपका है और मेरा आज आप हैं


शिक्षक दिवस पर अपने शिष्यों के लिए डॉ राजीव राज

Tuesday, August 11, 2009

silence;नीरवता


नीरवता श्रृंगार है , सौंदर्य निस्सीम ।

शब्द शोर हैं,शान्ति में है आनंद असीम


Tuesday, August 4, 2009

chhavi

chhoo gayee chhavi tumharee nayan
ho gayee sach meree kalpana
par prateeksha nirat hai abhee
deharee par sajee alpana

Friday, July 17, 2009

सच यह भी है

धारण कर खादी को जो शर्मिंदा करते हैं ,
ऐसे रंगे सियारों की सब निंदा करते हैं ,
पर सच यह भी है मित्रो इन बुतों बिजूकों को
हर चुनाव में हम तुम ही तो जिन्दा करते हैं

Wednesday, July 15, 2009

सुबह सलोनी

डाल डाल जीवन चले ,पात-पात संघर्ष
जो तजते धीरज नहीं,पाते हैं उत्कर्ष

सुबह सलोनी ने किए ,स्वर्णिम तीनों लोक
तम का तमस बुहारकर,दिया पुण्य आलोक

भंवरों का गुंजन मधुर,शीतल मंद समीर
ऊषा ने हर ली यथा , अंतर्मन की पीर

उनके माथे पर दिखे , चिंताजनित विभाव
लगभग बासठ की उमर, ड्यूटी आम चुनाव

खड़ा खेत की मेढ़ पर,निरखै पका अनाज
उमड़ें नीरद नयन में, नभ में गरजे गाज

अपनों ने जब दी व्यथा,अन्तर किया विदीर्ण
फूलों के पथ भी लगे, हमें कंटकाकीर्ण

Tuesday, July 14, 2009

पिता आत्मविश्वाश

धरती सम मैया मेरी , पिता यथा आकाश
मैया मेरी आत्मा , पिता आत्मविश्वाश

Friday, July 10, 2009

vedna aur geet

vyanjana hoon nayee, vyakaran do mujhe. shabd hoon,satya ka aacharan do mujhe. "VEDNA" devki man ki kara me hai geet hoon krishn sa awtaran do mujhe.

maa

Chehre par jhurri magar, damke divya swaroop.
swayam sulagkar surabhi de, maa pooja kee dhoop.

Jaise Kashi ki subah, Haridwar ki shaam.
man me pawnta bhare,maiya athon yaam.




Wednesday, July 8, 2009

APNA NAHEEN HAI WO.......

अपना नहीं है वो पराया भी नहीं hai.

nazmon में है wo बज्म में आया भी नहीं hai

तडपे हैं जिससे बिछड़ के मेरी ग़ज़ल के शेर

usne kabhee hothon pe sazaya bhee नहीं hai


पूछ उठी कविता कल हमसे कवी क्या काम तुम्हारा है

हम इतना ही कह पाए बस तनहाई के सघन तिमिर में

प्रहरों दिल का दीप जलाकर हमने तुम्हे पुकारा है


मन के आँगन में झरा जैसे हरसिंगार,

प्रिय ने जब मनुहार सुन खोले नैन किवार

pyasi dhartee kahe taras khao
tum ho badal to ab baras jaao

Monday, July 6, 2009

agyan k timir me hoon prakash chahiye,
sadmarg aur satya ka vishwash chahiye,
hum apni zindagi ko arthmay bana saken
GURUVAR k charan kamal ki suwash chahiye