Wednesday, July 8, 2009

APNA NAHEEN HAI WO.......

अपना नहीं है वो पराया भी नहीं hai.

nazmon में है wo बज्म में आया भी नहीं hai

तडपे हैं जिससे बिछड़ के मेरी ग़ज़ल के शेर

usne kabhee hothon pe sazaya bhee नहीं hai


पूछ उठी कविता कल हमसे कवी क्या काम तुम्हारा है

हम इतना ही कह पाए बस तनहाई के सघन तिमिर में

प्रहरों दिल का दीप जलाकर हमने तुम्हे पुकारा है


मन के आँगन में झरा जैसे हरसिंगार,

प्रिय ने जब मनुहार सुन खोले नैन किवार

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