अपना नहीं है वो पराया भी नहीं hai.
nazmon में है wo बज्म में आया भी नहीं hai
तडपे हैं जिससे बिछड़ के मेरी ग़ज़ल के शेर
usne kabhee hothon pe sazaya bhee नहीं hai
पूछ उठी कविता कल हमसे कवी क्या काम तुम्हारा है
हम इतना ही कह पाए बस तनहाई के सघन तिमिर में
प्रहरों दिल का दीप जलाकर हमने तुम्हे पुकारा है
मन के आँगन में झरा जैसे हरसिंगार,
प्रिय ने जब मनुहार सुन खोले नैन किवार
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