डाल डाल जीवन चले ,पात-पात संघर्ष
जो तजते धीरज नहीं,पाते हैं उत्कर्ष
सुबह सलोनी ने किए ,स्वर्णिम तीनों लोक
तम का तमस बुहारकर,दिया पुण्य आलोक
भंवरों का गुंजन मधुर,शीतल मंद समीर
ऊषा ने हर ली यथा , अंतर्मन की पीर
उनके माथे पर दिखे , चिंताजनित विभाव
लगभग बासठ की उमर, ड्यूटी आम चुनाव
खड़ा खेत की मेढ़ पर,निरखै पका अनाज
उमड़ें नीरद नयन में, नभ में गरजे गाज
अपनों ने जब दी व्यथा,अन्तर किया विदीर्ण
फूलों के पथ भी लगे, हमें कंटकाकीर्ण
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