जब जब दर्द आदमी का उपहास बना।
मानस वैभव की चौखट का दास बना।
अर्थ अर्थ बस अर्थ अनबुझी प्यास बना।
छल का ही पर्याय जबकि विश्वास बना।
मन के आसमान से शब्दों के पंछी
उड़कर अधरों की डाली पर आये हैं।
जग ने समझा हमने गीत सुनाये हैं।।
अजब सभ्यता की यह नूतन भोर है
मानवता का ही क्रंदन चहुंओर है
फुटपाथों से मंदिर की सीढ़ियों तलक
भूख ने सत्ता फैला ली पीढ़ियों तलक
हमने उस माँ के आँसू पोंछे जिसने
सूखी छाती से बच्चे बहलाये हैं।।
जग ने ...........
खेतों में संगीन उगाने वालों को।
खादी पहने बीन बजाने वालों को।
प्यार की बस्ती पर सोने की तोपों से
मतलब की बारूद उड़ाने वालों को।
अभिनन्दन में मधुर सुगन्धित हार नहीं
हमने शब्दों के अंगार चढ़ाए हैं।।
जग ने........
सुलग सभ्यता रही,आग ही आग दिखे।
अपनी अपनी ढपली अपना राग दिखे।
जाति ,क्षेत्र , मज़हब में बाँट रहे धरती
पहन हंस के कपड़े उड़ते काग दिखे।।
परिवर्तन हित संस्कार शालाओं में
हमने तो बस क्रांति बीज बिखराए हैं।।
जग ने.........
भावों की नगरी का कोई बंजारा,
राजनगर में भटका जब मारा मारा
सारी उम्र व्यक्त होने को तड़पा है
प्रेम सदा निर्धन का बेबस बेचारा
कितनी आँखों की लावारिस बूंदों पर
अंजुरी में ले हमने शब्द सजाए हैं।।
डॉ राजीव राज