इस मन में ही बीज नफरतों का फलता है।
और इसी में प्यार का पंछी भी पलता है।।
ये तो फितरत थी अपनी कि बन गए बख्तर।
वर्ना खंज़र में भी फ़ौलाद वही ढलता है।।
रात जो स्याह अँधेरे का महासागर है।
और इसी में प्यार का पंछी भी पलता है।।
ये तो फितरत थी अपनी कि बन गए बख्तर।
वर्ना खंज़र में भी फ़ौलाद वही ढलता है।।
रात जो स्याह अँधेरे का महासागर है।
वहीँ से रौशनी का देवता निकलता है।।
खोल सावन ने घटाओं के दिए हैं जूड़े ।
लबों पे आज कोई गीत सा मचलता है।।
चाँद को देख फिर से रूठ गया है नादाँ
दिल है कान्हा खिलोनों से कब बहलता है।।
डॉ राजीव राज
इटावा
डॉ राजीव राज
इटावा