Wednesday, July 31, 2013

ग़ज़ल

इस मन में ही बीज नफरतों का फलता है।
और इसी में प्यार का पंछी भी पलता है।।

ये तो फितरत थी अपनी कि बन गए बख्तर।
वर्ना खंज़र  में भी फ़ौलाद वही ढलता है।।

रात जो स्याह अँधेरे का महासागर है।
वहीँ से रौशनी का देवता निकलता है।।

खोल सावन ने घटाओं के दिए हैं जूड़े । 
लबों पे आज कोई गीत सा मचलता है।।

चाँद को देख फिर से  रूठ गया है नादाँ 
दिल है कान्हा खिलोनों से कब बहलता है।।

डॉ राजीव राज
इटावा