Saturday, November 13, 2010

पूजनीय दादी

जहाँ परमसुख धाम है जहाँ न कोई शोक।
पूजनीय दादी गयीं हमें छोड़ सुरलोक ॥

Friday, November 5, 2010

वो ऐसे अपना ग़म छुपाता है.....

फटे होठों से मुस्कुराता है।

वो ऐसे अपना ग़म छुपाता है॥ १॥

सब हकीकत,नीयत छुपाते हैं ।

वो सिर्फ अपना ग़म छुपाता है॥ २॥

वो बस्ती में नया नया सा है ।

तभी औरो से कम छुपाता है॥३॥

ये नादानी-ए-इश्क देखो तो ।
वो मुट्ठी में जुगनू छुपाता है॥ ४॥

यकीनन ये ज़ख्मगर ही होगा।

पकड़ लो, ये मरहम छुपाता है॥ ५॥

Friday, September 17, 2010

बिरवा की खातिर .......

बूँद- बूँद पर बहका बहका मन तो होगा ही ।


हां , सुहाना महलों का सावन तो होगा ही । ।


uska चूल्हा नहीं भींगता बारिश में।

भीगा - २ सावन मनभावन तो होगा ही । ।


शक की हद में रन्नो,सन्नो,मन्नो आती है ।


कोठी की मीना का तन पावन तो होगा ही । ।


जिस पर भी मजलूमों की आहों का गोटा हो ।


भरा तमाम दौलतों से दामन तो होगा ही । ।


शहर गए बेटे को कब अहसास हुआ ?


बिरवा की खातिर तरसा आँगन तो होगा ही । ।


Sunday, May 30, 2010

हो गयी सच मेरी कल्पना...........

छू गयी छवि तुम्हारी नयन , हो गयी सच मेरी कल्पना ।
पर प्रतीछा निरत है अभी , देहरी पर सजी अल्पना ॥

मन के मंदिर में जैसे जली अर्चना के लिए धूप है,
उम्र की लौ को छूकर हुआ यों सुगन्धित तेरा रूप है।
देखकर तुमको ही कर सका जग विधाता की परिकल्पना॥
छू गयी ...............
छप गया है ह्रदय पृष्ठ पर जो तुम्हारे नयन ने पढ़ा ,
यह उसी काव्य का छंद है जो मेरी भावना ने गढ़ा ॥
आज भी घोल जाती है रस अनकहे गीत की व्यंजना ॥
छू गयी ..........
चुभ गया कोई काँटा कहीं लाडली नींद के पाँव में ,
यों मेरी रैन बीती तेरी याद के वृक्ष की छाँव में ,
मेंह बन नेह का झर परो , हो नवल सृष्टि की सर्जना
छू गयी .............

पर्वत पर मंदाकिनी ...

जिंसकी रुनझुन ताल पर ,थिरका था मन मोर ।
वह नूपुर अब मौन है , होकर विरह विभोर ।

अधर सुधामय,चंद्रमुख , करे कमल छवि क्षीण ।
चन्द्र उदय क्यों ?जब प्रियाषोडस कला प्रवीण ॥

रूप रत्न मणि कल्पतरु, के पल्लव सा हाथ ।
धन्य धनी मैं पा प्रिये , श्री सम तेरा साथ ॥

पर्वत पर मंदाकिनी , की निर्मल जलधार ।
यथा धरा के कंठ पर, शोभित मुक्ताहार ॥