जिंसकी रुनझुन ताल पर ,थिरका था मन मोर ।
वह नूपुर अब मौन है , होकर विरह विभोर ।
अधर सुधामय,चंद्रमुख , करे कमल छवि क्षीण ।
चन्द्र उदय क्यों ?जब प्रियाषोडस कला प्रवीण ॥
रूप रत्न मणि कल्पतरु, के पल्लव सा हाथ ।
धन्य धनी मैं पा प्रिये , श्री सम तेरा साथ ॥
पर्वत पर मंदाकिनी , की निर्मल जलधार ।
यथा धरा के कंठ पर, शोभित मुक्ताहार ॥
No comments:
Post a Comment