छू गयी छवि तुम्हारी नयन , हो गयी सच मेरी कल्पना ।
पर प्रतीछा निरत है अभी , देहरी पर सजी अल्पना ॥
मन के मंदिर में जैसे जली अर्चना के लिए धूप है,
उम्र की लौ को छूकर हुआ यों सुगन्धित तेरा रूप है।
देखकर तुमको ही कर सका जग विधाता की परिकल्पना॥
छू गयी ...............
छप गया है ह्रदय पृष्ठ पर जो तुम्हारे नयन ने पढ़ा ,
यह उसी काव्य का छंद है जो मेरी भावना ने गढ़ा ॥
आज भी घोल जाती है रस अनकहे गीत की व्यंजना ॥
छू गयी ..........
चुभ गया कोई काँटा कहीं लाडली नींद के पाँव में ,
यों मेरी रैन बीती तेरी याद के वृक्ष की छाँव में ,
मेंह बन नेह का झर परो , हो नवल सृष्टि की सर्जना
छू गयी .............
barkhurdar likhte ho batate bhi nahi wah-2 kya likha hai-Lalit
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