Wednesday, February 27, 2013

मधुमास रहेगा

चिन्ता  न  करो  कैसा  इतिहास रहेगा।
वेणी में,मुकुट में,कि रज में वास रहेगा।
उर के निलय में  फूल सी सुगंध तो रखो 
फिर तुम जहाँ वहीँ पर मधुमास रहेगा।।

जीवन की डायरी

पूछो न हमको इससे क्यों प्यार बहुत है।
हालाँकि   याद के  घड़े  में भार  बहुत है।
चाहा था फोड़ना समय के फर्श पर मगर ,
सच है कि दिल से आदमी लाचार बहुत है।।


प्राणों  में  कौन आकर  निर्वात भर गया।
आँखों में बिना मौसम बरसात भर गया।
पल भर को उजाले की ओर देख क्या लिया
तकदीर में वो उम्र भर को रात भर गया।।


जीवन की डायरी पे दस्तखत बना गयी।
तकदीर हमें बिन पते का ख़त बना गयी।
यों  तो  हमें  भी  याद  उसूलों  के पाठ थे,
मजबूर हमको लेकिन गुर्बत बना गयी।।

Tuesday, February 26, 2013

सूर्य का बिछौना

पीर कुछ  भी नहीं  है प्राण का खिलौना है।
ओस आँसू की सुख के सूर्य का बिछौना है।
ज़िन्दगी के हरएक पल को जियो जी भर के,
बाद जीवन के जो होना है सो तो होना है।।

अपनी आशाओं को विश्वास बनाकर देखो।
कर्म की शक्ति से इतिहास  बनाकर  देखो।
ज़िन्दगी की फसल भी लहलहा के झूमेगी ,
दुःख के माहौल को उल्लास बनाकर देखो।।

Saturday, February 23, 2013

पिंजड़े से जैसे छूट के....

पिंजड़े  से  जैसे  छूट के पंछी निकल गया ।
दिनमान सुख का ऐसे हमेशा को ढल गया।
वो कल भी थी मोहताज़ निवालों को आज भी,
सरकार बदलने से उसका क्या बदल गया ?

हिमालय

पीड़ा  धरा की देख न पाया विव्हल हुआ।
रोया  तो बही यमुना गंगा में जल हुआ।
दुनियाँ में हिमालय सा बड़ा कौन हो सका
पाषाण हो के भी जो सृष्टी हित तरल हुआ।।


Tuesday, February 19, 2013

जीवन का अर्थ ..

जीवन का अर्थ , अर्थ शब्दकोश  में  कहाँ
भावों की गिन्नियां हृदय के कोष में कहाँ
सब मूल्यवान हो गए, पर मूल्य खो गए 
वैभव की चकाचौंध है, हम होश में कहाँ।।

पूनम   के रेशमी  स्वरुप  पर  मचल  गया।
छूने  को  चाँद  जैसे  समन्दर  उछल  गया।
देकर  व्यथा  पहाड़  सी  ये  उम्र  का  हिरन ,
जीवन से दूर किसकी खोज में निकल गया।।

Sunday, February 17, 2013

चिट्ठियाँ

मधुमास छिपा है कहीं वनवास छिपा है।
चिट्ठी के शब्द शब्द में अहसास छिपा है।
सम्बोधनों से हीन, शब्दहीन, अर्थमय
वाक्यों का वो अजीब सा विन्यास छिपा है।।


चिट्ठी के शब्द-शब्द में इतिहास छिपा है।
उच्छ्वास छिपा है कहीं उल्लास छिपा है।
जीवन के ख़ास राज़ की चाबी हैं चिट्ठियाँ ,
मत पूछिए कि इनमे कौन ख़ास छिपा है।।

गीतों में मेरे इसलिए....

संवेदनाओं  का  प्रवाह  श्रोत  हृदय  है।
सुख सर्जना जहाँ है वहीं दुःख प्रलय है।
जीवन ही चूंकि आग और जल से है बना
गीतों में मेरे अथ विरह के संग प्रणय है।।

Tuesday, February 12, 2013

..... मगर गीत नहीं है

जो साधना विहीन है  संगीत नहीं है।
जो भावना विहीन है वो मीत नहीं है।
आँसू न जिसका शब्द-शब्द चूमने लगे
शब्दों की व्यवस्था है मगर गीत नहीं है।।

गीतों में भर के मैं ह्रदय का ज्वार सौंपने।
आदर्श  हो  रहे  हैं  तार - तार  सौंपने।
टकसाल वाली राह को आया हूँ छोड़कर
लाया हूँ स्वाभिमान की हुँकार सौंपने।।

Wednesday, February 6, 2013

भक्त होने को

भाव की तरह वो तड़पी है व्यक्त होने को
प्रेम के पंथ  पर  गमन  विरक्त  होने को
साथ रहकर भी न रिश्ते को नाम दे पाई
राधिका तब बनी मीरा थी भक्त होने को  

Friday, February 1, 2013

और दो कराह मीत गीत को निखार दो...

दर्द   को   उभार   दो , वेदना   अपार   दो।
मैं करूँ समर्पण तुम किन्तु तिरस्कार दो।
और दो कराह मीत गीत को निखार  दो।।

प्राण ने दिया उड़ेल पुतलियों के द्वार पर
और पलक ने धकेल आँख को बुहार कर।
निष्ठुर निष्कासन यों पूंछ पूंछ कारन क्यों
अश्रु अनाश्रित, उदास, बैठ गए हार कर।

शब्द के अभाव को, भाव के प्रवाह को ,
अंतर्मन से उपजी अंतस की आह को
प्रीत की प्रतीत के स्वरुप को दुलार दो।।
और दो कराह मीत गीत को निखार  दो।।

वक़्त के धरातल पे, टूट  जो  बिखर गया।
सांस सांस बांसुरी में बस विराग भर गया।
जो मिलन की आस था सुख का अहसास था
भोर की हिलोर बोल वो सपन किधर गया।

रैन  के  खुमार  को,  नैन  की  बहार  को
तप्त तृषित मन पे प्रिय छविमय बौछार को
पालकी सपन की सजन द्वार पे उतार दो।।
और दो कराह मीत  गीत  को  निखार  दो।।

दर्द   को   उभार   दो , वेदना   अपार   दो
मैं करूँ समर्पण तुम किन्तु तिरस्कार दो
और दो कराह मीत गीत को निखार  दो

डॉ राजीव राज 9412880006