दर्द को उभार दो , वेदना अपार दो।
मैं करूँ समर्पण तुम किन्तु तिरस्कार दो।
और दो कराह मीत गीत को निखार दो।।
प्राण ने दिया उड़ेल पुतलियों के द्वार पर
और पलक ने धकेल आँख को बुहार कर।
निष्ठुर निष्कासन यों पूंछ पूंछ कारन क्यों
अश्रु अनाश्रित, उदास, बैठ गए हार कर।
शब्द के अभाव को, भाव के प्रवाह को ,
अंतर्मन से उपजी अंतस की आह को
प्रीत की प्रतीत के स्वरुप को दुलार दो।।
और दो कराह मीत गीत को निखार दो।।
वक़्त के धरातल पे, टूट जो बिखर गया।
सांस सांस बांसुरी में बस विराग भर गया।
जो मिलन की आस था सुख का अहसास था
भोर की हिलोर बोल वो सपन किधर गया।
रैन के खुमार को, नैन की बहार को
तप्त तृषित मन पे प्रिय छविमय बौछार को
पालकी सपन की सजन द्वार पे उतार दो।।
और दो कराह मीत गीत को निखार दो।।
दर्द को उभार दो , वेदना अपार दो
मैं करूँ समर्पण तुम किन्तु तिरस्कार दो
और दो कराह मीत गीत को निखार दो
डॉ राजीव राज 9412880006