भाव की तरह वो तड़पी है व्यक्त होने को
प्रेम के पंथ पर गमन विरक्त होने को
साथ रहकर भी न रिश्ते को नाम दे पाई
राधिका तब बनी मीरा थी भक्त होने को
प्रेम के पंथ पर गमन विरक्त होने को
साथ रहकर भी न रिश्ते को नाम दे पाई
राधिका तब बनी मीरा थी भक्त होने को
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