पूछो न हमको इससे क्यों प्यार बहुत है।
हालाँकि याद के घड़े में भार बहुत है।
चाहा था फोड़ना समय के फर्श पर मगर ,
सच है कि दिल से आदमी लाचार बहुत है।।
प्राणों में कौन आकर निर्वात भर गया।
आँखों में बिना मौसम बरसात भर गया।
पल भर को उजाले की ओर देख क्या लिया
तकदीर में वो उम्र भर को रात भर गया।।
जीवन की डायरी पे दस्तखत बना गयी।
तकदीर हमें बिन पते का ख़त बना गयी।
यों तो हमें भी याद उसूलों के पाठ थे,
मजबूर हमको लेकिन गुर्बत बना गयी।।
हालाँकि याद के घड़े में भार बहुत है।
चाहा था फोड़ना समय के फर्श पर मगर ,
सच है कि दिल से आदमी लाचार बहुत है।।
प्राणों में कौन आकर निर्वात भर गया।
आँखों में बिना मौसम बरसात भर गया।
पल भर को उजाले की ओर देख क्या लिया
तकदीर में वो उम्र भर को रात भर गया।।
जीवन की डायरी पे दस्तखत बना गयी।
तकदीर हमें बिन पते का ख़त बना गयी।
यों तो हमें भी याद उसूलों के पाठ थे,
मजबूर हमको लेकिन गुर्बत बना गयी।।
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