Saturday, November 17, 2012

पाँच मुक्तक और ........

उम्र  की  शाम  भी चाहो  जो  सुहानी  रखना
दिल के गुलदान में कुछ याद पुरानी रखना
प्यास होठों की ख़त लिखे जो तुम्हे आँसू के
चूमने के लिए दिलबर की निशानी रखना


हर एक सांस सुरीला सितार हो जाये
और जीवन  ये महकती बयार हो जाये
तुम जो स्वीकार कर लो नेह निमंत्रण मेरा
मेरा दावा है ये मन गीतकार हो जाये


अब तो इन बंद मुट्ठियों को खोलना होगा
दिल की डांडी पे पाप पुन्य तोलना होगा
इससे पहले कि पीढ़ियों के गुनहगार बने
मौन को तोड़कर हम सबको बोलना होगा


जब कभी मंदिरो - मस्जिद में पाप होता है
यकीन मानिये भगवान का दिल रोता है
हो गुनहगार पुजारी या मौलवी कोई
बोझ तो पाप का सारा समाज ढोता है


अजनबी शहर में पहचान को तरसे कितने
भीड़ में एक अदद इन्सान को तरसे कितने
तोड़ जो जन्म का बंधन तलाक दे आयी
ये मेरे लब उसी मुस्कान को तरसे कितने


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