सत्ता षडयंत्र दिखे, बेबस गड्तंत्र दिखे
बारूदी पिंजर में , जीवन परतंत्र दिखे
चेतन है ठगा ठगा चहुँदिश जडतन्त्र दिखे
आँगन ने कटुता की नागफनी बोई
कविता दुखियारी कल फूट फूट रोई
अधरों के गाँव छोड़कर कहाँ मुस्कुराहटें चलीं गयीं
लाज की महावर रंगीं पायल की आहटें चलीं गयीं
घायल सम्बन्ध दिखे, आहत अनुबंध दिखे
रिश्तों की धरती पर स्वारथ छलछंद दिखे
गुमसुम सी राखी है,टूटी बैसाखी है
भौजी संग देवर की नोंक झोंक खोई
कविता दुखियारी तब फूट फूट रोई
कबिरा की राह निहारी, तुलसी को टेर लगाई
मीरा रसखान की डगर हारी पर हेर न पाई
कोई तो स्वजन दिखे,शब्दशिल्प सृजन दिखे
भाव भूमि 'देव' तुल्य , 'सूरा' सम गगन दिखे
आहत मन पाखी है , क्षत - विक्षत साखी है
मानस की दशा देख ओढ़नी भिगोई
कविता दुखियारी तब फूट फूट रोई
मानवता राजपथ पकड़, वैभव की नींद सो गयी
सन्नाटों के ऊसर में, आहों के बीज बो गयी
संवेदन हीन दिखे, भावना विहीन दिखे
चेहरे पर चेहरों की कला में प्रवीन दिखे
पीड़ाएँ गहरीं हैं , सोये युग प्रहरी हैं
अर्थ के समंदर में लेखनी डुबोई
कविता दुखियारी तब फूट फूट रोई
शारदा की बिटिया तब फूट फूट रोई
डॉ राजीव राज, इटावा
09412880006
बारूदी पिंजर में , जीवन परतंत्र दिखे
चेतन है ठगा ठगा चहुँदिश जडतन्त्र दिखे
आँगन ने कटुता की नागफनी बोई
कविता दुखियारी कल फूट फूट रोई
अधरों के गाँव छोड़कर कहाँ मुस्कुराहटें चलीं गयीं
लाज की महावर रंगीं पायल की आहटें चलीं गयीं
घायल सम्बन्ध दिखे, आहत अनुबंध दिखे
रिश्तों की धरती पर स्वारथ छलछंद दिखे
गुमसुम सी राखी है,टूटी बैसाखी है
भौजी संग देवर की नोंक झोंक खोई
कविता दुखियारी तब फूट फूट रोई
कबिरा की राह निहारी, तुलसी को टेर लगाई
मीरा रसखान की डगर हारी पर हेर न पाई
कोई तो स्वजन दिखे,शब्दशिल्प सृजन दिखे
भाव भूमि 'देव' तुल्य , 'सूरा' सम गगन दिखे
आहत मन पाखी है , क्षत - विक्षत साखी है
मानस की दशा देख ओढ़नी भिगोई
कविता दुखियारी तब फूट फूट रोई
मानवता राजपथ पकड़, वैभव की नींद सो गयी
सन्नाटों के ऊसर में, आहों के बीज बो गयी
संवेदन हीन दिखे, भावना विहीन दिखे
चेहरे पर चेहरों की कला में प्रवीन दिखे
पीड़ाएँ गहरीं हैं , सोये युग प्रहरी हैं
अर्थ के समंदर में लेखनी डुबोई
कविता दुखियारी तब फूट फूट रोई
शारदा की बिटिया तब फूट फूट रोई
डॉ राजीव राज, इटावा
09412880006
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