Wednesday, November 14, 2012

छः मुक्तक

व्यंजना की धरा पे नभ सा व्याकरण होगा
शब्द की रूह तक पे सत्य का वरण होगा
वेदना देवकी है क़ैद मन की कारा में
गीत का आज कन्हैया सा अवतरण  होगा

 चेतना हूँ  मैं   सिर्फ़ मुझको जागरण  दे दो
भावना हूँ  मैं  सुकोमल सी आवरण दे दो
 आह संवेदना की आँख से मैं छलका हूँ
गीत हूँ अपने अधर पर मुझे शरण  दे दो


तुम्हारी आस मेरी साँस की रवानी है
दिल तुम्हारी ही चाहतों  की राजधानी है
आ भी जाओ कि सूखती है भोर की तुलसी
तुम्हारे बिन न महकती ये रात रानी है

थाम  लो हसरतों का ज्वार मुझे छूलो ना
दिल को आ जायेगा करार मुझे छूलो ना
चेतना सी जो मेरी ज़िन्दगी की सोई है
जाग जायेगी बस एकबार मुझे छूलो ना

मैं अपने आंसुओं का अर्घ्य चढ़ाने आया
वेदना की  जटा से गीत  बहाने आया
भूख से जिनका दम निकल गया गरीबी में
मैं भगीरथ उन्ही को मुक्ति दिलाने आया

बंद कमरे में ही दुनियां समेट लेते हैं
कब कहाँ क्या-2 हो रहा है देख लेते हैं 
गज़ब ये डिजिटली बन्दे हैं नयी पीड़ी के
दिमाग से ही दिल की जंग जीत लेते हैं




   

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