यौवन की देहरी पे अल्पना संवर गयी।
सपनों के दीप आँख के आँगन में धर गयी।
बेला सी खिल उठी सुकल्पनाओं की कली,
मन पे ये किसकी रूप चांदनी बिखर गयी।।
बारिश वो ज़िन्दगी जो ज़मीं पर उभार दे।
है वो हवा जो देह की थकन उतार दे।
वादक न सिर्फ अपनी पीर बांसुरी का हो,
कवि वो जो ज़माने के दर्द को दुलार दे।।
सपनों के दीप आँख के आँगन में धर गयी।
बेला सी खिल उठी सुकल्पनाओं की कली,
मन पे ये किसकी रूप चांदनी बिखर गयी।।
बारिश वो ज़िन्दगी जो ज़मीं पर उभार दे।
है वो हवा जो देह की थकन उतार दे।
वादक न सिर्फ अपनी पीर बांसुरी का हो,
कवि वो जो ज़माने के दर्द को दुलार दे।।
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