Thursday, March 13, 2014

ग़ज़ल


शाख पतझड़ ने  जब  सताई है।
आँख  रह रह  के  डबडबाई है।।


छोड़   तन्हा   चले   गये   अपने,
अब  न  देता कोई  दिखायी  है।।

कौन   सी    बूँद   मेंट   दे  जाने,
ज़ीस्त   जैसे  कि   रोशनाई  है।।
 
बारहा   इक   खता  हुयी  हमसे,
पीर  होरी   की  हमने  गाई  है।।

हलकू  कम्बल  नहीं खरीद सका
पूस   की   रात   लौट  आयी है।।

क्या  बुरा  सोचना  किसी  का भी
मुझमें   शायद   यही   बुराई   है।।

आपको  देख  कर  कहा  दिल  ने
जिंदगी     सिर्फ    आशनाई   है।।

"राज"  ईमां   न   बेच   पाये  जब
लाश  रिश्तों  की  तब  उठायी है।।

खुद   मिटी   और   दे  गयी   रंगत,
प्रीत   मेंहदी  ने   यूँ    निभाई   है।।

डॉ राजीवराज
12/03 /14

1 comment: