मंत्र के शोर में , स्वरमयी भोर में
छवि उभरने लगी नयन की कोर में
कल्पना रूप की सर्जना कर उठी.1
स्वांस की रागिनी अर्चना कर उठी 11
हो सुगन्धित भले किन्तु है व्यर्थ ही
निर्जने पर्वतों पर भटकता पवन
मैं अनायास ही काल के कुंड में
कर गया बिन गिने कितनी साँसे हवन
मन की स्थिति नयी ,है परिस्थिति नयी
बोझ थी जिस पे हर सांस हाँ अब वही
ज़िन्दगी उम्र की याचना कर उठी 1
स्वांस की रागिनी अर्चना कर उठी 11.
मिल गए थे कि जिसमे सभी फूल ही
चाह के ,धूल वह आज कुमकुम हुई
आह जो तोड़कर स्वर का धागा गयी
थी ,वही आज ज्यों गीत मधुरिम हुई
जन्म से दूर थी, उम्र मजबूर थी
खोज में जिस के थक कर हुई चूर थी
पा के सम्मुख उसे वंदना कर उठी 1
स्वांस की रागिनी अर्चना कर उठी 11
आज अमवा तले कर रही चांदनी
अनमने अपने प्रिय तम से मनुहार है
भाल पे,गाल पे पुष्प के झर रहा
चुम्बनों सा मृदुल ओस का प्यार है
नयन में छवि धवल, मुख पे घूंघट नवल
स्वप्न की सुन्दरी , प्रीत की गंध मल
सत्य संसर्ग की कामना कर उठी 1
स्वांस की रागिनी अर्चना कर उठी 11
छवि उभरने लगी नयन की कोर में
कल्पना रूप की सर्जना कर उठी.1
स्वांस की रागिनी अर्चना कर उठी 11
हो सुगन्धित भले किन्तु है व्यर्थ ही
निर्जने पर्वतों पर भटकता पवन
मैं अनायास ही काल के कुंड में
कर गया बिन गिने कितनी साँसे हवन
मन की स्थिति नयी ,है परिस्थिति नयी
बोझ थी जिस पे हर सांस हाँ अब वही
ज़िन्दगी उम्र की याचना कर उठी 1
स्वांस की रागिनी अर्चना कर उठी 11.
मिल गए थे कि जिसमे सभी फूल ही
चाह के ,धूल वह आज कुमकुम हुई
आह जो तोड़कर स्वर का धागा गयी
थी ,वही आज ज्यों गीत मधुरिम हुई
जन्म से दूर थी, उम्र मजबूर थी
खोज में जिस के थक कर हुई चूर थी
पा के सम्मुख उसे वंदना कर उठी 1
स्वांस की रागिनी अर्चना कर उठी 11
आज अमवा तले कर रही चांदनी
अनमने अपने प्रिय तम से मनुहार है
भाल पे,गाल पे पुष्प के झर रहा
चुम्बनों सा मृदुल ओस का प्यार है
नयन में छवि धवल, मुख पे घूंघट नवल
स्वप्न की सुन्दरी , प्रीत की गंध मल
सत्य संसर्ग की कामना कर उठी 1
स्वांस की रागिनी अर्चना कर उठी 11
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